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जब महात्मा गांधी ने म्यांमार में अहिंसात्मक क्रांति का प्रचार किया

4 दिसंबर, 1947 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में यू नू और महात्मा गांधी के बीच हुई अंतिम मुलाकात की तस्वीर। चित्र व शीर्षक द इरावदी से।

वी यान आंग द्वारा रचित यह लेख, म्यांमार के एक स्वतंत्र समाचार वेबसाइट द इरावदी से है और सामग्री साझा करने के समझौते के तहत यहाँ पुनर्प्रकाशित है।

बर्तानी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेता महात्मा गांधी, हैंडलूम एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के लिए भारतीय नागरिकों से चंदा इकट्ठा करने और बर्मा के लोगों के साथ अपने अनुभव साझा करने के लिए 7 मार्च 1929 को म्यांमार पहुंचे थे।

उन्होंने तत्कालीन रंगून में जुबली हॉल और फिच स्क्वायर (जिसे अब महाबंडोला पार्क के नाम से जाना जाता है) में लोगों को संबोधित किया। उन्होंने श्वेदागन पगोडा में बौद्ध भिक्षुओं के साथ बातचीत भी की:

I am glad to find you telling me that the hponegyis (Buddhist monks) are leading the political movement in Burma, but you have a serious responsibility upon your shoulders when you undertake leading a political battle.

History shows that the clergy has not always interfered with the political matters to the benefit of mankind. Very often unworthy ambition has moved the clergy of the world as it has moved unscrupulous men to take part in politics, and if now you hponegyis aspire to lead the political movement of this, one of the fairest lands on the face of the earth, you are shouldering a tremendous responsibility.

मुझे आपसे यह जानकर खुशी हो रही है कि बर्मा में राजनीतिक आंदोलन बौद्ध भिक्षुओं की अगुआई में हो रहा है, लेकिन जब आप एक राजनीतिक लड़ाई का नेतृत्व करते हैं तो आपके कंधों पर एक गंभीर जिम्मेदारी होती है।

इतिहास ने हमें सिखाया है कि पादरियों और पुरोहितों ने राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप हमेशा मानव जाति के लाभ के लिए ही नहीं किया है। अनेकों बार अपात्र महत्वाकांक्षा ने उन्हें उसी तरह राजनीति की तरफ खींचा है जिस तरह से बेईमान पुरुषों को और अगर अब आप भिक्षुकगण यहाँ, जो इस पृथ्वी की सबसे निष्पक्ष भूमि में से एक है, एक राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व करने की इच्छा रखते हैं, तो यह आप पर एक जबरदस्त उत्तरदायित्व है।

अपनी दो सप्ताह की यात्रा में, उन्होंने मध्य और निचले म्यांमार के कई शहरों का दौरा किया। मांडले में उन्होंने कहा:

In India it is a common saying that the way to swaraj (which means independence for India) is through Mandalay. The British government has taught you too a great lesson by incarcerating one of India’s great sons here.

The way to swaraj is the way of suffering—indeed no country has come to its own without suffering.

भारत में यह एक आम कहावत है कि स्वराज (जिसका अर्थ है भारत के लिए स्वतंत्रता) मांडले के माध्यम से है। बर्तानी सरकार ने भारत के महान बेटों में से एक को यहाँ क़ैद कर आपको बहुत बड़ी प्रेरणा दी है।

स्वराज का मार्ग पीड़ा का मार्ग है ‍और वस्तुतः किसी भी देश को यह बिना कष्ट उठाये नहीं मिला है।

औपनिवेशिक शासन का विरोध करने के कारण भारतीय राजनीतिक नेता सुभाष चंद्र बोस को अक्टूबर 1924 में मंडेला में ढाई साल की कैद हुई थी। अपनी यात्रा के दौरान, गांधी ने कहा:

I have no other and no better guidance to offer to you than to commend to your attention the general principle of non-violence, in other words, self-purification.

मेरे पास आपको देने हेतु इससे बेहतर और कोई मार्गदर्शन नहीं है कि आप अपना सारा ध्यान
अहिंसा के सामान्य सिद्धांत पर या अन्य शब्दों में कहूं तो आत्म-शुद्धि पर लगायें।

गांधी ने 24 मार्च को म्यांमार की अपनी तीसरी यात्रा संपन्न की। 1929 की यात्रा से पहले, वे 1902 और 1915 में म्यांमार आये थे।

गांधी के अहिंसा के उपदेशों ने कालांतर में बर्मा की राज्य काउंसलर दाऊ आंग सान सू की को लोकतंत्र की लड़ाई में प्रभावित किया।गांधी हॉल और गांधी अस्पताल म्यांमार के राजनीतिक और स्वास्थ्य सेवाओं से संदर्भ में महत्वपूर्ण स्थान बन गए। यू नू, जो म्यांमार के पहले प्रधान मंत्री बने, ने गाँधी से 1947 में नई दिल्ली में मुलाकात की थी।

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